महंगाई की समस्या

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(A shorter version with about 150 words was posted in this blog earlier and is still available).

महंगाई आज देश की सबसे बड़ी आर्थिक समस्या है।

महंगाई एक ऐसी गंभीर समस्या है जिस पर लगाम नहीं लगाई गई तो देश में अराजकता फैल जाएगी, जिसे संभाल पाना सरकार के लिए मुश्किल होगा।

महंगाई की वजह अनेक हैं।

अर्थ शास्त‌्रियों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दामों में भारी वृद्धि, अंतरराष्ट्रीय मंदी और बारिश की कमी ने महंगाई को बेकाबू कर दिया है। खाद्यान्न उत्पादन में लगातार गिरावट आ रही है।

खाद्यान्न उत्पादन को सुरक्षित जमा करना अवश्य है जिस से ऊत्पादन कम होने के समय दाम स्थिर रख सखते हैं। लेकिन आलू, गन्ना और गेहूं के लिए कि कोल्ड स्टोरेज, मिलों और सरकार के गोदामों में जगह नहीं बचती।

महंगाई की समस्या और खेती में सुधार के लिए हमें बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देना होगा। आज भी अस्सी फीसदी से अधिक किसान खेती के लिए मानसून पर निर्भर हैं। मानसून पर उनकी निर्भरता को खत्म करना न केवल किसानों के लिए, बल्कि देश की आधी आबादी का पेट भरने के लिए भी जरूरी है।

महंगाई रोकने के लिए व्यापारियों की भंडारण सीमा को कम करना, जमाखोरी रोकने के लिए छापेमारी तेज करना, आयात संबंधी संभावनाओं पर सार्वजनिक रूप से चर्चा करना जरूरी है ताकि लगे कि जल्द ही बाहर से खेप आने वाली है। ये कुछ ऐसे उपाय हैं, जिनसे मंहगाई को बढ़ने से रोका जा सकता है।

डीजल की कीमतों में भी मामूली सी कमी करके महंगाई पर अंकुश लगाया जा सकता है। कोशिश होनी चाहिए कि किसानों को अपनी फसल की उचित कीमत मिले और उपभोक्ताओं का भी उत्पीड़न न हो।

आमतौर पर महंगाई की चर्चा वस्तुओं के दामों के संदर्भ में ही होती है। किंतु इधर सेवाओं की महंगाई भी तेजी से बढी है। खासतौर पर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी व्यवस्थाओं को जानबूझकर बिगाडने तथा निजी स्कूलों – अस्पतालों के बाजार को बढ़ावा देने का काम बाजारवादी सोच के तहत सुनियोजित तरीके से हो रहा है। इससे शिक्षा और इलाज दोनो काफी महंगे हुए है।

वायदा कारोबार से भी महंगाई बढ़ रही है।

इतना ही नही सरकार तमाम कृषि उपजों के ‘वायदा बाजार’ को बहुत तेजी से बढावा दे रही है। सोने-चांदी का वायदा कारोबार तो ठीक है लेकिन गेहूं, चना, दालों, सोया-तेल, चीनी, मसालों, आलू आदि अनेक खाद्य-वस्तुओं को वायदा बाजार के दायरे में लाया जा चुका है। यह एक तरह का कानूनी सट्टा है और इसमें बडे-बडे सट्टेबाज बिना कुछ किए करोडो का वारा-न्यारा कर लेते है। इन्हीं के कारण कीमते एकाएक बढ जाती है।

तेज विकास के साथ विकास जनित अनेक चुनौतियां भी देश के सामने खड़ी हो रही हैं। महंगाई, भ्रष्टाचार, प्रदूषण, काला धन और बेतरतीब शहरीकरण ऐसी ही चुनौतियां हैं। यदि हम इन चुनौतियों का सफलता पूर्वक सामना नहीं कर सके, तो समृद्धि हमारे लिए विपत्ति बन सकती है।

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